Home देश विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस – पत्रकारिता पर हावी कॉरपोरेट

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस – पत्रकारिता पर हावी कॉरपोरेट

असुरक्षित पत्रकार, माफिया और राजनीति हावी

बदलता स्वरूप डिजिटल होती पत्रकारिता

छिंदवाड़ा। आज विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस और इस दिन को को मनाने के पीछे कारण यह है की प्रेस की स्वतंत्रता पत्रकारों की सुरक्षा और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की रक्षा की जा सके। लेकिन अब इन बातों का कोई महत्व पत्रकारिता में नजर नहीं आता । ना ही वास्तविक पत्रकारिता बची है और ना ही वास्तविक पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। अब सच लिखने वाले पर विरोधी का टैग लगा दिया जाता है और सच की अनदेखी कर दी जाती है। पत्रकारिता का यह हाल पिछले कुछ सालों में देखने को मिला है और यही कारण है कि आज इस दिवस पर इस बात पर विचार करना सबसे ज्यादा जरूरी है कि आखिर पत्रकारिता किस स्तर पर आ गई है। और क्या पत्रकारिता पर कॉर्पोरेट भारी हो गया है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की घोषणा 1993 में हुई थी इसके पीछे उद्देश्य यह था कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का अधिकार मिले साथ ही पत्रकारों की सुरक्षा पर भी ध्यान दिया जाए लेकिन बदलते वक्त के साथ अब प्रेस का स्वरूप भी बदलते जा रहा है। जहां सोशल मीडिया हावी हो गया है वही वास्तविक प्रेस मालिकों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया है। पिछले 10 – 12 सालों में प्रेस का लगातार गिरता स्तर हर किसी के सामने है। पत्रकारिता से सच कोसों दूर है और इतनी बंदिशें है कि ऊपर से लेकर नीचे तक सच लिखने पर कई कैंचिया चल जाती है। इतना ही नहीं जो सच लिखता है उसकी सुरक्षा पर भी खतरा है लगातार माफिया, राजनीतिक संरक्षण प्राप्त अवैध कारोबारी पत्रकार पर हमले की फिराक में रहते हैं। जिससे सच लिखना और बोलना लगभग बंद सा हो गया है। पिछले दिनों मेरा अनुभव हुआ कि जैसे ही लोगों को सच पढ़ाया गया तो एकाएक पढ़ने वालों की संख्या बढ़ने लगी। लोग सच सुनना और पढ़ना चाहते हैं लेकिन पत्रकारिता से अब सच कोसों दूर है।

जमाने की आवाज उठाने वाला खुद लाचार

पत्रकार से उम्मीद की जाती है कि वह भ्रष्टाचार, शासन, प्रशासन की कमियां और लाचार लोगों के दुख को उजागर कर उन्हें न्याय दिलाए। लेकिन सच्चाई है कि इन सब की आवाज उठाने वाला पत्रकार खुद लाचारी का जीवन जी रहा है। पत्रकार की नौकरी 24 घंटे की नौकरी है जिस तरीके से पुलिस अस्पताल और अन्य ऐसी जगह पर काम करने वाले लोग 24 घंटे की नौकरी करते हैं। वैसे ही पत्रकार भी 24 घंटे सक्रिय रहता है। लेकिन खुद की आवाज उठाने का दम पत्रकार में नहीं है। और ना ही कोई उसकी आवाज सुनने वाला है। आज बड़े-बड़े संस्थानों में मामूली सी तनख्वाह के भरोसे पत्रकार जीवन जी रहा है। महंगाई आसमान पर चढ़ गई लेकिन पत्रकार जहां की वही खड़ा है। एक तरह से कई मीडिया संस्थान पत्रकारों का शोषण ही कर रहे हैं कई संस्थानों में तो एक पत्रकार की तनख्वाह 5000, 8000 और ₹10000 तक है जितने रुपए का पेट्रोल ही पत्रकार खर्च कर देता है। 2014 के पहले पत्रकारों के उत्थान के लिए एक मजीठिया आयोग का गठन हुआ था। जिसने पत्रकारों के हक की लड़ाई तो लड़ी लेकिन 2014 के बाद यह आयोग कहां गया और इसकी सिफारिशें क्यों लागू नहीं की गई यह बात सरकार से पूछने वाला कोई नहीं है।

कॉरपोरेट के हाथों की कठपुतली बने मीडिया हाउस

मीडिया हाउस अब स्वतंत्र प्रेस नहीं कहलाते। अब यह मीडिया हाउस कहलाते हैं जिसका काम विज्ञापनों और कई ऐसे मामलों के जरिए रुपए कमाने का है जो एक पत्रकार उठता है। ऐसा माना जा सकता है कि मीडिया हाउस अब कॉर्पोरेट के हाथ की कठपुतली बन चुके हैं। पिछले कुछ सालों में एक शब्द मीडिया के लिए बोला जाने लगा है यह शब्द है (गोदी मीडिया )जो सुनकर हम जैसे पत्रकारों को शायद बहुत बुरा लगता है। लेकिन वास्तविकता कहीं ना कहीं इसके आसपास है। सच लिखने वाले को उसका भूगतमान भी भुगतना पड़ता है। मैं आज आप सभी को कोरोना काल की एक खबर याद दिलाना चाहूंगा। जो एक बड़े अखबार ने प्रकाशित की थी। इस अखबार ने कोरोन की भयावहता दिखाते हुए उत्तर प्रदेश में गंगा नदी के तट पर बिखरी लाशों का एक फोटो प्रकाशित किया था। यह कोरोना काल की वास्तविकता थी। हमारे अपने शहर में हजारों लोगों की मौत हुई। लेकिन उस फोटो के प्रकाशित करने के बाद उस बड़े अखबार को लगभग 2 सालों तक सरकारी विज्ञापन नहीं मिले। आखिर सच लिखने की सजा इस अखबार को क्यों दी गई। क्या यही प्रेस की स्वतंत्रता है। अब यह सवाल उठने लगा है की सरकार और कॉरपोरेट मिलकर मीडिया हाउस चला रहे हैं या फिर आज हम दिखावे के लिए विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मना रहे।

घटना परक पत्रकारिता का दौर, सोशल मीडिया सक्रिय

पत्रकारिता का एक और दौर इन सालों में शुरू हुआ है। जिसमें सोशल मीडिया भी उभर कर सामने आया है। यहां तक की सरकार का जनसंपर्क विभाग पुलिस का जनसंपर्क विभाग ऐसे कई विभागों के पपीआरओ सोशल मीडिया पर आ गए । यहां तक की राष्ट्रीय स्तर से लेकर जिला स्तर तक जनसंपर्क फेसबुक और व्हाट्सएप पर सक्रिय है। सोशल मीडिया खबरों के आदान-प्रदान का एक बड़ा जरिया बन गया है। और पत्रकारिता घटनापरक होकर रह गई है।पत्रकारिता केवल घटनाओं पर ही खबरें प्रकाशित करती या बनती है। अखबार तो फिर भी ठीक है लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया केवल घटना पत्रकारिता ही कर रही है। उस पर भी खबरों को लगाने और चलाने का अधिकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मीडिया हाउस पर ही निर्भर है।

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर
एक पत्रकार…अविनाश सिंह
9406725725