मुकद्दम लगा रहे दरबार, कर रहे सुनवाई और फैसले
नेहरिया खदान में आंदोलन, खदान बंद करने की नौबत
छिंदवाड़ा। देश की आजादी के पहले आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित मुकद्दम और पटेल सरकार जिले में एक बार फिर बनने लगी है। हालांकि संविधान लागू होने के बाद पहले के सभी कानून रद्द कर दिए गए । लेकिन अब फिर से आदिवासी मुकद्दम सरकार बनाकर अपने मामलों की सुनवाई खुद कर रहे हैं। और फैसला भी सुना रहे हैं। बड़ी बात यह है कि जिले के कई ग्रामों में मुकद्दम सरकारों का गठन हो गया और जिला प्रशासन को पता ही नहीं है। यह मामला कोयलांचल के नेहरियां में तब उजागर हुआ जब कोयला खदान में काम करने वाले ठेका मजदूर को मिलने वाली मजदूरी को लेकर मुकद्दम सरकार ने हल्ला बोल दिया। पिछले 17 दिनों से नेहरीय में आंदोलन चल रहा है । और अब हालात यह है कि नेहरिय खदान बंद करने की नौबत आ गई है। नेहरिया खदान में ठेका मजदूरों को कम मजदूरी देने के मामले में स्वयंभू मुकदम सरकार ने दरबार लगाया और यह फैसला किया कि जब तक मजदूरों को निर्धारित मजदूरी नहीं मिलती तब तक कोई भी मजदूर खदान में नहीं जाएगा। यह मामला है ठेका मजदूरों का मुकदम सरकार के फैसले के बाद नहरिया खदान में केवल खदान के कामगार ही काम कर पा रहे हैं। हालत यह है कि पिछले 10 दिनों से नेहरीय खदान से कोयले के उत्पादन परिवहन जैसे सभी काम प्रभावित हुए हैं। खदान से एक ट्रक कोयला भी बाहर नहीं गया जिससे वेकोलि को खासा नुकसान उठाना पड़ रहा है । लेकिन बड़ी बात यह है कि इस आंदोलन को लीड करने वाली मुकद्दम सरकार अचानक अस्तित्व में आई है । इस सरकार को लीड करने वाले दबंग आदिवासी युवा नेता भी उभरकर सामने आ रहे हैं ।
मांग जायज लेकिन मुकद्दम सरकार पर सवाल
कोयलांचल की लगभग सभी खदानों में ठेका मजदूरों के साथ होने वाले अन्याय और कम मजदूरी देने के मामले नए नहीं है । ठेका मजदूरों के साथ खदानों में पूरी तरह से अन्याय किया जा रहा है । सरकार के द्वारा निर्धारित मजदूरी देना तो दूर की बात है इन मजदूरों को स्वास्थ्य सेवाएं और खदान में काम करने के लिए उपकरण तक उपलब्ध नहीं कराए जाते । पिछले दिनों परासिया में एक ठेका मजदूर की मौत होने के बाद ठेकेदार ने उसे अपनी गाड़ी में बैठने को लेकर जिद की जिसके बाद इलाज समय पर न मिलने के कारण उस मजदूर की मौत हो गई। ऐसे कई मामले खदानों में मौजूद है । नेहरिया खदान में जिस बात को लेकर आंदोलन किया जा रहा है। वह जायज है लेकिन यहां सवाल एक ऐसी सरकार का है जो कि राज्य सरकार के खिलाफ खड़ी नजर आ रही है। और जिस तरह के आंदोलन जिले भर में हो रहे हैं उससे यह बात दिखने लगी है कि जिले के आदिवासियों का इस तरह का आंदोलन और प्रदर्शन बालाघाट और छत्तीसगढ़ जैसे हालात ना उत्पन्न कर दे।
बालाघाट, बैतूल से भी आए सरकार के प्रतिनिधि
नेहरिया में हुए आंदोलन में केवल नेहरिया ग्राम की मुकद्दम सरकार मौजूद नहीं थी। बल्कि इस आंदोलन में कोयलांचल के कई क्षेत्रों से आदिवासी शामिल हुए थे। इतना ही नहीं मुकद्दम सरकार को अस्तित्व में लाने के लिए पूरे प्रदेश में गठन हो गए और मुकद्दम सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कई नेता बनाए गए हैं। नेहरिया में हुए आंदोलन में भी बालाघाट और बैतूल जिले से मुकद्दम सरकार के प्रतिनिधि पहुंचे थे। जिन्होंने पूरे आंदोलन का प्रतिनिधित्व किया और डब्लू सी एल प्रबंधन सहित जिला प्रशासन को हिला कर रख दिया। बड़ी बात यह है कि अब मुकद्दम सरकार यह मांग करने लगी है की खदानों में केवल आदिवासी ही काम करेंगे । और उन्हें हर सुविधा देनी होगी। जिले की खदानों में आदिवासियों के अलावा किसी के भी काम करने पर मुकद्दम सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया है।
सविधान के अनुक्षेद 13(1)और 13(3)a का दे रहे हवाला

मुकद्दम सरकार के गठन और हर ग्राम में मुकद्दम की नियुक्ति के मामले में जब एक मुकद्दम सरकार का एक लेटर पैड पढ़ने को मिला तो पता चला कि इस सरकार का गठन करने वाले संविधान के अनुच्छेद 13 (1) व 13 (3)क, का हवाला दे रहे हैं। जिसमें यह कहा गया है कि पहले के सभी कानून को रद्द कर दिया गया है। लेकिन यह तब तक मान्य होगा जब तक की ऐसी किसी जाती या समुदाय के साथ उनके अधिकारों और हक का हनन नहीं हो रहा है। इसी आधार पर आदिवासी अपने हक और अधिकारों की लड़ाई मुकद्दम सरकार बनाकर लड़ रहे हैं। हालांकि संविधान में साफ-साफ यह भी कहा गया है कि ऐसे किसी भी मामले में सुनवाई का अधिकार न्यायालय को होगा। खुद सरकार बनाकर सुनवाई का अधिकार देने की बात संविधान में कहीं नहीं लिखी गई है।
गंभीर समस्या…अविनाश सिंह
9406725725
खबर सूत्र – ललित तिवारी परासिया।









