शहर की जनता ने भाजपा को नही बनाने दी थी शहर सरकार
28 पार्षद सहित महापौर भी जीती थी कांग्रेस, अब फिर बदल गए हालत
चुनाव में 18 पार्षद पर सिमटी भाजपा ने दल बलवाकर हथिया लिया निगम
छिंदवाड़ा। भारत का लोकतंत्र हमेशा से ही बहुत सशक्त लोकतंत्र माना जाता रहा है। लेकिन अब लगने लगा है कि लोकतंत्र पर राजनीति हावी हो गई है। जनता जिसको नकार देती है राजनीति खरीद फरोख्त और प्रलोभन के जरिए उन्हीं को सिरमौर बना लेती है और जनता ठगी की ठगी रह जाती है। ऐसा ही कुछ छिंदवाड़ा शहर में भी हुआ जहां जनता ने 2022 में भाजपा को सिरे से नकार दिया था वही आज 2024 में दल बदलू कांग्रेसियों ने भाजपा का दामन थाम कर पूरी नगर निगम को भाजपा के हवाले कर दिया।
12 साल की नगर पालिका और 5 साल की नगर निगम में भाजपा काबिज थी लेकिन जिस तरह से शहर की हाल हुए सड़के खुद गई जहां- तहां गड्ढे ही गड्ढे नजर आने लगे लोग शहर के वार्डों में चार-पांच साल तक लगातार नालियां कीचड़ देख-देख कर परेशान हो गए तो शहर की जनता ने भाजपा को सिरे से नकार दिया और शहर सरकार के लिए कांग्रेस का चुनाव किया।
लेकिन सिर्फ 2 साल बाद ही पूरी नगर निगम फिर से भाजपा के कब्जे में आ गई जनता ने जिन्हें नकारा था दल बदलू कांग्रेसियों ने पाला बदलकर फिर से उन्हें सिरमौर बना लिया है।
क्या यह लोकतंत्र है या फिर एक ऐसी राजनीति जिसमें सत्ता का लालच छुपा हुआ है। यह सवाल अब शहर के हर उस शहरी के दिमाग में उठने लगा है जिसने शहर सरकार के लिए कांग्रेस को ज्यादा बेहतर माना था। और 48 वार्डों में से 28 वार्ड कांग्रेस को जिताए थे यहां तक की महापौर भी कांग्रेस का ही चुना गया था। आज स्थिति यह है की महापौर विक्रम आहके सहित 14 पार्षद भाजपा का दामन थाम चुके हैं।
2022 में 18 पार्षद पर सिमट गई थी भाजपा
नगर निगम छिंदवाड़ा के चुनाव 2022 मैं हुए जिसमें शहर के 48 वार्डों में से 28 वार्डों में कांग्रेस पार्षदों ने जीत हासिल की थी। जबकि भाजपा केवल 18 वार्डों में ही जीत हासिल कर पाई। पार्षद निर्दलीय जीते थे। जिसमे से एक निर्दलीय पार्षद ने भी कांग्रेस को समर्थन दे दिया था। इस तरह से कांग्रेस 29 पार्षदों के साथ बहुमत में आ गई और शहर सरकार कांग्रेस की बनी। यहां तक की महापौर विक्रम आहके जो एक सीधा सरल चेहरा 2022 में था। उसे भी शहर की जनता ने सिर आंखों पर बिठाया लेकिन अब हालात बदल गए महापौर विक्रम आहके सहित कांग्रेस के 14 पार्षद जिनमें चार सभापति भी शामिल है। भाजपा में चले गए अब भाजपा के पास दो निर्दलीय पार्षदों को मिलाकर लगभग 34 पार्षदों की एक बड़ी संख्या हो गई है। जबकि कांग्रेस के पास केवल 14 पार्षद ही बचे हैं। इसका मतलब साफ है कि लोकसभा चुनाव के बाद नगर निगम का संचालन पूरे तौर पर भाजपा के हाथ में आ जाएगा।

दलबदल कानून लागू नहीं, नही होंगे चुनाव
अब एक सवाल सभी के जेहन में है कि क्या कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वाले पार्षदों और महापौर को फिर से चुनाव लड़ना पड़ेगा। लेकिन यहां आपको बता दें की नगर पालिका अधिनियम में दल बदल कानून लागू नहीं है। पंचायत पर भी यह कानून लागू नहीं होता। मतलब जो भी पार्षद या महापौर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में गए हैं उन्हें चुनाव नहीं लड़ना पड़ेगा पहले वह कांग्रेस के पार्षद कहलाते थे अब भाजपा के पार्षद कहलाएंगे। इस तरह के परिवर्तन में किसी भी तरह के फिर से चुनाव कराने का कोई प्रावधान नगर पालिका नगर निगम अधिनियम में है ही नहीं।
जनता की सेवा या मलाई खाने का जरिया है नगर निगम
लोकतंत्र में निर्वाचन एक प्रक्रिया है। जैसे ही किसी दल का वर्चस्व चुनाव के बाद नगर निगम या सरकार या पंचायत ऐसे किसी भी निकाय में होता है तो लोकतंत्र के जरिए जनता संचालक चुनती है। और फिर वह सरकार के आदमी हो जाते हैं तो फिर यह दल बदल क्यों हुआ। जनता ने भाजपा के 18 पार्षद जिताए और कांग्रेस के 28 पार्षद जीता कर कांग्रेस को नगर निगम का संचालन सौंपा। तो फिर यह फेरबदल क्यों हुआ क्यों कांग्रेसी पार्षद भाजपा में गए और जनता के फैसले को दरकिनार कर भाजपा फिर से नगर निगम में काबिज हो गई। क्या यह चुने हुए नेता जनता की सेवा करने के लिए चुने गए या फिर नगर निगम में कोई ऐसी मलाई है जिसे खाने की होड़ मची हुई है। इन सब बातों पर लोकसभा चुनाव के बाद एक और चर्चा का दौरा चलेगा तब हम यह देखेंगे कि आखिर नगर निगम में ऐसा क्या है की जनता के द्वारा चुने हुए लोग पार्टियां बदलकर दूसरे पाले में जा रहे हैं।
विश्लेषण….अविनाश सिंह
9406725725









