तीन दिन बीते किसी थोक विक्रेता पर कार्रवाई नहीं
किसानों की मजबूरी 266 का यूरिया 450 में खरीदना
छिंदवाड़ा । जिले में प्रशासनिक तंत्र कैसे कम कर रहा है इसका एक ताजा तरीन उदाहरण गुरुवार को उस समय देखने को मिला । जब यूरिया की किल्लत और कालाबाजारी सहित महंगा यूरिया बेचने की शिकायतों पर कलेक्टर ने चिल्लर विक्रेताओं की एक बैठक आयोजित की। इस बैठक के दौरान जिले भर में यूरिया बेच रहे दुकानदारों ने कलेक्टर के मुंह पर कह दिया की थोक विक्रेता उन्हें महंगा बेच रहे हैं तो किसानों को महंगा यूरिया देना उनकी मजबूरी है। और यह बात जिला प्रशासन ने खुद मानी कि जिले में किसानों को यूरिया 266 रुपए की जगह 350 रुपए से लेकर 450 रुपए तक बेचा जा रहा है। अब आते हैं प्रशासन के मुंह पर खुदरा विक्रेताओं के जवाब का क्या असर हुआ इस बात पर। तो पिछले तीन दिन में किसी भी ठोक विक्रेता के खिलाफ जिला प्रशासन, कृषि विभाग, या यूरिया के लिए जिम्मेदार विभाग ने कोई कार्रवाई नहीं की। और वह बैठक केवल दिखावा बन के रह गई । आज भी जिले की कई दुकानों में यूरिया की कीमत 350 से लेकर 450 रुपए तक है। किसानों की मजबूरी है कि अब मक्का यूरिया मांग रहा है । सही समय पर यूरिया का छिड़काव मक्के की फसल पर नहीं किया गया तो वह मक्का बर्बाद हो जाएगा। यही कारण है कि किसान महंगा यूरिया खरीदने के लिए मजबूर हैं।
सहकारी दुकानों में सीमित बोरिया दे रहे, बाजार से खरीदने दबाव
यूरिया के लिए किसानों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिला प्रशासन खरीफ का सीजन आने से 2 महीने पहले से यूरिया का भंडारण शुरू कर देता है । और किसानों को यह भी कहा जाता है कि वह एडवांस में यूरिया खरीद कर रख ले । लेकिन बड़ी विडंबना यह है की एक किसान को उसकी जमीन और पावती पर ही यूरिया सहकारी दुकानों से मिलता है। मतलब साफ है कि जिला प्रशासन खुद इस बात के लिए दबाव बना रहा है कि किसान यूरिया महंगे दामों में बाजार से खरीदें। जब यूरिया की खासी आवश्यकता फसल को होती है। तब किसान को सहकारी दुकानों में घंटों लाइन में लगना पड़ता है। इतना ही नहीं कई बार तो दो और चार दिन केवल तीन-चार बोरी यूरिया लेने में लग जाते हैं। जबकि फसल को तत्काल ही यूरिया की आवश्यकता होती है। और किसानों की मजबूरी हो जाती है कि वह महंगी कीमत में बाजार से यूरिया की खरीदारी करें । बाजार में 266 रुपए कि यूरिया की बोरी की कीमत 350 रुपए से 450 रुपए तक है। उस पर भी दुकानदार यूरिया की कालाबाजारी होने का बहाना बनाकर महंगे दामों में किसानों को यूरिया देता है। ताकि किसान मनमानी कीमत पर यूरिया खरीदे।
यूरिया की कालाबाजारी और ज्यादा कीमत में पूरा तंत्र शामिल
जिले में लगभग 5 लाख हैक्टेयर भूमि पर खरीफ की फसल लगाई जाती है। छिंदवाड़ा जिला मक्के की फसल के लिए पूरे प्रदेश में अव्वल है। उसके बाद भी यहां यूरिया की कीमतों को लेकर और कालाबाजारी को लेकर लगभग हर साल किसान परेशान होते हैं । हर साल यूरिया की कीमतों पर सवाल उठाए जाते हैं। और हर साल यूरिया की किल्लत को लेकर किसान परेशान होते हैं। लेकिन बड़ी बात यह है कि जिला प्रशासन पिछले कई सालों से इस गंभीर समस्या को सुलझा नहीं पाया है। आखिर क्यों यूरिया की कालाबाजारी और महंगी कीमत में बाजार में यूरिया बेचने के मामलों में प्रशासन कार्रवाई नहीं कर रहा है। इसका मतलब साफ है कि यूरिया की महंगी कीमतों के लिए कालाबाजारी जिम्मेदार है, और इन पूरे मामलों में पूरा तंत्र शामिल है। छोटे दुकानदार से लेकर होलसेल कारोबारी और होलसेल कारोबारी से लेकर जिम्मेदार विभागों के अधिकारी कर्मचारी । यह सभी किसानों से उनकी मजबूरी का फायदा उठाने के काम में बराबरी के भागीदार हैं। जहां किसानों पर मौसम की मार पड़ती है और कई बार फसलें बर्बाद हो जाती है। वही यह पूरा तंत्र और माफिया किसानों की जेब ढीली करने से बाज नहीं आ रहा है।
Note : – खबर का सोर्स जिला प्रशासन ( 17 जुलाई की विज्ञप्ति)
भ्रष्टाचार…Avinash Singh
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