बड़े भाई के दबाव में ज्वाइन की थी भाजपा, अब बगावत
बीमार पड़े तो काम आए कमलनाथ, फिर हुआ हृदय परिवर्तन
छिंदवाड़ा। राजनीति में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले अमित सक्सेना एक बड़े क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। और उनके बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि वह किसी के भरोसे राजनीति नहीं करते। फिर भी पिता स्वर्गीय बैजनाथ सक्सेना की विरासत को उन्होंने आज तक कायम रखा था और लगातार कमलनाथ के साथ पिछले लोकसभा चुनाव तक कंधे से कंधा मिलाकर डटे रहे। इस दौरान अपने बड़े भाई दीपक सक्सेना का साथ भी उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। हमेशा से ही एमएलए की टिकट का प्रबल दावेदार होने के बाद भी दीपक सक्सेना के लिए हमेशा ही पीछे की कतार में खड़े रहे।
आज वही अमित सक्सेना भाजपा और सरकार के सामने बगावती तेवर दिखा चुके हैं। अपने भाषण में उन्होंने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि वह जनता के लिए काम करते हैं। और जो उनसे प्रेम करेगा वह उसके साथ ही रहेंगे। अमित सक्सेना वर्तमान में भाजपा में है और उनके भाजपा में होने का कारण भी बड़े भाई दीपक सक्सेना का साथ देना था । क्योंकि दीपक सक्सेना लोकसभा चुनाव के पहले कमलनाथ को छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए और उन्हीं के दबाव के चलते अमित सक्सेना ने भी अपने बड़े भाई का साथ नहीं छोड़ा। लेकिन अब यह दिखाई देने लगा है कि 50 से भी ज्यादा वर्षों का राजनीतिक साथ दीपक सक्सेना और अमित सक्सेना का अलग-अलग होगा।
जिला भाजपा के नोटिस के बाद भी अमित सक्सेना ने किसानों की भीड़ के साथ उनकी समस्याओं को पुरजोर ताकत से रखा। सरकार से मांगे मनवाने के लिए ज्ञापन दिया । इसके बाद अब अमित सक्सेना का अगला कदम क्या होगा इस बात पर भाजपा और कांग्रेस दोनों की ही नजर टिकी हुई है। जो इस बात की तरफ इशारा करती है की अमित सक्सेना का झुकाव वापस कांग्रेस की तरफ या यूं कहें की कमलनाथ की तरफ होने लगा है।
बगावती तेवर : किसका नुकसान ज्यादा दीपक या भाजपा
अमित सक्सेना के बगावती तेवर इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि अमित सक्सेना का भाजपा से मोह भंग हो गया है । यही कारण है कि भाजपा संगठन की तरफ से नोटिस मिलने के बाद भी अमित सक्सेना ने जिला भाजपा अध्यक्ष को दो टूक शब्दों में 13 अक्टूबर के बाद बात करने की बात कही और अपने आंदोलन को लेकर अड़े रहे। इस बगावती तेवर से यह साफ हो गया है कि अमित सक्सेना भाजपा से संतुष्ट नहीं है। और वह वापस कांग्रेस की तरफ रुख कर सकते हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा फायदा किसको मिलेगा या किसको नुकसान होगा यह बड़ा सवाल है। अमित सक्सेना के वापस कांग्रेस में जाने से क्या बीजेपी को कोई नुकसान होगा या फिर इसका सीधा खामियांजा दीपक सक्सेना को भुगतना पड़ेगा।
क्योंकि दीपक सक्सेना जिस मजबूती के साथ भाजपा में शामिल हुए थे। उसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी अमित सक्सेना भी है। अमित सक्सेना छिंदवाड़ा विधानसभा के ग्रामीण क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं । जो विधानसभा और लोकसभा दोनों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। निश्चित रूप से भाई का अलग होना दीपक सक्सेना के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। पहले से ही भाजपा में दीपक सक्सेना का कद उतना नहीं बढ़ पाया। जिस हैसियत पर वे कांग्रेस में राज करते थे। कांग्रेस में रहते हुए रोहना दरबार छिंदवाड़ा जिले का दूसरा सबसे बड़ा दरबार था। लेकिन भाजपा में एक वरिष्ठ नेता होने के नाते जो पूछ परख होनी चाहिए वह कम ही दिखाई देती है।
ऐसी अनुशासनहीनता बार बार करूंगा : अमित सक्सेना

अपने क्षेत्र में किसानों और ग्रामीणों की समस्याओं पर लगातार बैठक कर रहे अमित सक्सेना को जिला भाजपा अध्यक्ष शेषराव यादव ने संगठन के खिलाफ अनुशासनहीनता के लिए नोटिस जारी किया है। लेकिन अमित सक्सेना ने इस बात का पलटवार अपने आंदोलन के दौरान किया। उन्होंने साफ कहा अपने क्षेत्र की जनता और किसानों की समस्या को उठाना और उनकी समस्याओं के लिए सरकार तक बात पहुंचाना अनुशासनहीनता है तो वह बार-बार इस तरह की अनुशासनहीनता करेंगे। वह भाजपा के नोटिस पर कोई जवाब नहीं देंगे, उन्हें अगर निष्कासित किया जाता है तो यह भाजपा की अपनी मर्जी है।
अमित सक्सेना के बेबाक बयान कहीं भाजपा पर ही भारी न पड़ जाए। क्योंकि यह बात तो सच है की एक जनप्रतिनिधि होने के नाते जनता की समस्या को उठाना उनका कर्तव्य भी है और भाजपा के सदस्य होने के नाते अधिकार भी। क्योंकि यही काम शिवराज सिंह चौहान ने बुधनी में भी किया है। उन्हें उन्होंने तो सीधे सरकार पर हमला बोल दिया। लेकिन उन पर अब तक कोई कार्रवाई न संगठन ने की है और ना सरकार ने। फिर अमित सक्सेना को नोटिस क्यों जारी किया गया यह सवाल आम जनता के जेहन में उठ रहा है।
राजनीतिक विश्लेषण… Avinaash Siingh
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