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लोकतंत्र का चौथा स्तंभ टेंट में… और सोशल मीडिया एसी होटल में !

क्या…अब प्रेस नहीं रहा जनता और सत्ता के बीच का माध्यम

प्रेस को 10 मिनट में निपटाया, सोशल मीडिया से एक घंटे गप्पे

छिंदवाड़ा। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले प्रेस या मीडिया की हालत क्या हो गई है ? यह बात 7 अगस्त को उस समय समझ आई जब पूरी मध्य प्रदेश सरकार छिंदवाड़ा में थी। और सरकार के एक प्रकल्प जन विश्वास अभियान की शुरुआत छिंदवाड़ा से की गई। इस अभियान की शुरुआत के लिए देश के लगभग सभी बड़े मीडिया हाउस के पत्रकार भोपाल और जबलपुर से छिंदवाड़ा पहुंचे। छिंदवाड़ा जिले का भी पूरा मीडिया मुख्यमंत्री के इस प्रयास को कवरेज देने के लिए तत्पर दिखाई दिया। लेकिन इसी बीच एक अंतर भी दिखाई दिया। देश के प्रख्यात मीडिया हाउसेस के पत्रकारों को सरकारी टेंट में बैठाया गया और लगभग तीन घंटे के इंतजार के बाद मुख्यमंत्री पत्रकारों से मुखातिब हुए । वे महज 10 मिनट में अपनी बात कहकर धन्यवाद बोलकर निकल गए और पत्रकारों के सवाल अधूरे ही रह गए। मुख्यमंत्री के छिंदवाड़ा आगमन पर मध्य प्रदेश सरकार ने एक और आयोजन किया। यह आयोजन था सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर मीट ।

इस आयोजन के लिए बाकायदा सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर को इनवाइट किया गया । उन्हें एक एसी होटल में बिठाया गया और बाकायदा एक भोज के साथ मुख्यमंत्री ने इन सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर से लगभग 1 घंटे तक हंसी ठिठौली की और गप्पे लड़ाए। मतलब साफ है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब टेंट के लायक रह गया है । जबकि सोशल मीडिया को वह स्थान मिलने लगा है जो कभी प्रेस को मिला करता था । आखिर यह अंतर क्यों ? क्या अब प्रेस सरकार या मुख्यमंत्री या नेताओं के लिए उतना महत्व नहीं रखता जितना कि सोशल मीडिया रखने लगा है । क्योंकि इस आयोजन के बाद से यह सवाल लगातार उठ रहा है की वास्तविक पत्रकारों के सवालों के लिए अब नेताओं के पास समय नहीं है । या सब कुछ पहले से तय है और जो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कभी जनता और सत्ता के बीच का माध्यम हुआ करता था। जनता की आवाज सत्ता के कानों तक पहुंचना था। आज उसकी हालत सरकारी टेंट में मुख्यमंत्री का इंतजार करते रहने की रह गई है।

लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग हो रहा अपंग !

प्रेस की अब इतनी भी हैसियत नहीं रही कि पत्रकारों को सरकारी आयोजनों में एंट्री दी जा सके। 7 अगस्त के मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को ही ले लीजिए। मुख्यमंत्री ने हवाई पट्टी पर पत्रकारों से कोई बात नहीं की। उनका दूसरा कार्यक्रम एफडीडीआई में प्रमोशन पाने वाले कर्मचारियों के द्वारा सम्मान किया जाने का था। जहां पत्रकारों को एंट्री नहीं थी । पुलिस ने पत्रकारों की गाड़ियों को एडीडीआई तक जाने ही नहीं दिया। तीसरा कार्यक्रम मुख्यमंत्री का शासकीय महिला आईटीआई का निरीक्षण था । जहां पत्रकारों की एंट्री नहीं थी अधिकारियों ने साफ कह दिया कि पत्रकारों को यहां कवरेज करने नहीं दिया जाएगा। चौथा कार्यक्रम मुख्यमंत्री का लोक सेवा केंद्र का निरीक्षण था । यहां पर खुद जिला पंचायत सीईओ कमान संभाले हुए थे। यहां पर भी पत्रकारों को एंट्री नहीं दी गई। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ने कलेक्टर कार्यालय में लगभग 2 घंटे बिताए।

इस दौरान शिकायतकर्ताओं की शिकायत सुनी गई जो कि पहले से तय थे। उद्यमियों और जनप्रतिनिधियों की बैठक ली गई। अधिकारियों की बैठक ली गई। इस दौरान भी पत्रकारों को कहीं इंट्री नहीं दी गई। अधिकारियों ने साफ कह दिया कि पत्रकारों को केवल टेंट में बैठना है और मुख्यमंत्री खुद आकर उनसे बात करेंगे । जब तीन घंटे इंतजार के बाद मुख्यमंत्री आए तो 10 मिनट में अपनी बात कह कर चले गए । यह हालत अब वास्तविक मीडिया की रह गई है । की सरकारी आयोजनों में मुख्यमंत्री कार्यालय के लोग फोटो और वीडियो ग्राफी करते हैं । प्रेस से बात करते समय भी मुख्यमंत्री कार्यालय के कैमरामैन मीडिया के कैमरा चलाने वाले के सामने खड़े हो गए और प्रेस को लगभग तुच्छ दृष्टि से ही देखा गया। कि यह इनका काम है और शायद पहले से तय है की क्या छापा जाएगा, क्या दिखाया जाएगा। बड़ी विडंबना है कि एक समय प्रेस लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग हुआ करता था जो आज अपंग हो गया है।

प्रेस की इस हालत का जिम्मेदार कौन…क्या बनेंगे हालात ?

आखिर प्रेस की इस हालात का जिम्मेदार कौन है ? आजादी के पहले से भारत के लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग रहा प्रेस अब अपंग है। इसके पीछे का कारण क्या है, इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण है प्रेस से एडिटरशिप का खत्म होना । अब मीडिया हाउस कॉर्पोरेट के इशारे पर चलता है। और वही छापा और वही दिखाया जाता है जो कारपोरेट जगत तय करता है। बात सच भी है मीडिया हाउस चलाने के लिए जिन रुपयों की जरूरत पड़ती है। वह कॉरपोरेट जगत से आते हैं। लेकिन एक सच यह भी है की अब प्रेस की स्थिति केवल घटनाक्रम की जानकारी देने तक सीमित रह गई है। और सरकारी आयोजनों में क्या दिखाया जाना है क्या लिखा जाना है यह सब कुछ पहले से निश्चित है। शायद इसी वजह से बहु प्रशिक्षित मीडिया कर्मी सरकारी आयोजनों के लिए बाहर से भेजे जाते हैं । मुझे याद है लगभग 25 साल की पत्रकारिता के दौरान जब मैं देश के प्रतिष्ठित अखबार में काम करता था।

तब ऐसे किसी आयोजन के लिए अलग-अलग काम तय किए जाते थे। पॉजिटिव और नेगेटिव दोनों ही पक्षों को बराबरी से तरजीह दी जाती थी। लेकिन आज का दौर सिर्फ पॉजिटिविटी दिखाने का रह गया है। यही कारण है कि वास्तविकता से लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बहुत दूर होता जा रहा है या दूर हो गया है । जबकि सोशल मीडिया जिस पर कोई नियंत्रण नहीं है और नियंत्रण हो भी नहीं पाएगा यह बात सरकार समझ गई है। इसलिए आज लोकतंत्र का चौथा स्तंभ टेंट पर है और सोशल मीडिया एसी कमरों में मुख्यमंत्री से गप्पे लड़ा रहा है। क्योंकि जो सच्चाई प्रेस जनता के सामने नहीं ला पा रहा, वही सच्चाई बेखौफ होकर सोशल मीडिया दिखा देता है। मतलब साफ है कि सच से सबको डर लगता है और प्रेस अब सच से दूर है।

मीडिया हाउस हो जाएं सावधान.. जल्द शुरू होगी कटौती !

प्रेस की जो हालात अब नेताओं सरकार और राजनीतिक पार्टियों की नजरों में है। उससे अब करोड़ों रुपए का मुनाफा कमाने वाले मीडिया हाउस को सचेत हो जाना चाहिए। क्योंकि आज मीडिया हाउस की इनकम एक्सट्रीम स्टेज पर है। जिस तरह से राजनेता, राजनीतिक पार्टियां, सरकार खुद सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर को इंटरटेन कर रही है। वह दौर दूर नहीं है जब मीडिया हाउसों को मिलने वाले विज्ञापनों में कटौती होगी। इस कटौती का हिस्सा सोशल मीडिया पर खर्च किया जाएगा। 7 अगस्त को छिंदवाड़ा में जो सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर मीट हुई उसके लिए बाकायदा जिला प्रशासन ने दो महीने तक काम किया। छांट छांट कर सोशल मीडिया के ऐसे लोग बाहर निकाले गए। जिनके विवर्स लाखों में थे। बाकायदा इसकी पूरी डिटेल सरकार को भेजी गई। वहां से छटनी हुई और फिर इन सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर को बातचीत करने के लिए मुख्यमंत्री ने अपना भरपूर समय दिया। मतलब साफ है की जो सच सोशल मीडिया के माध्यम से बाहर आ रहा है। वह सच राजनेताओं के गले की हड्डी बन सकता है । यही कारण है कि जल्दी मीडिया हाउसों की कमाई में कटौती भी संभव है।

संपादकीय…Avinaash Siingh
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