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झुलसे बच्चों को जबलपुर भेजने नहीं मिली 108 एंबुलेंस, प्राइवेट एंबुलेंस से भेजा !

लापरवाही की हद, लेकिन अब तक जिम्मेदारी तय नहीं

मामला मासूमों की जान का, कैसे हुआ शॉर्ट सर्किट पता नहीं

छिंदवाड़ा। छिंदवाड़ा जिला अस्पताल सह मेडिकल कॉलेज में एनआईसीयू के वार्मर में लगी आग ने प्रबंधन की लापरवाही और जिम्मेदारों की करगुजारियों को उजागर कर दिया है। स्वास्थ्य को लेकर जिले में जिला प्रशासन से लेकर स्वास्थ्य महकमा कितना सक्रिय है, इस बात का जीता जागता प्रमाण इस घटना से मिला। जब गंभीर रूप से झूलते हुए बच्चों को जबलपुर रेफर किया गया। रेफर करने के बाद शासन की योजना के तहत चलने वाली 108 एंबुलेंस तक बच्चों को जबलपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचाने के लिए नहीं मिली। इन बच्चों को प्राइवेट एंबुलेंस से जबलपुर भेजा गया। यह लापरवाही की हद और जिम्मेदारों की कारगुजारी का नतीजा है की जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग का 108 एंबुलेंस पर भी नियंत्रण नहीं है।

हालांकि यह व्यवस्था ठेकेदारी प्रथा में चल रही है। लेकिन 108 योजना का काम जिले में कैसे चल रहा है यह देखने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन और स्वास्थ्य महकमें की है। बड़ी विडंबना है कि एक तरफ सरकार बेहतर स्वास्थ्य उपलब्ध कराने की बात कर रही है। मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने की बात की जाती है। गर्भवती महिलाओं को घर से अस्पताल लाने और छोड़ने की जिम्मेदारी लेने की बात की जाती है। और दूसरी तरफ जिला अस्पताल में हुए एक हादसे के बाद झूलते हुए बच्चों को 108 एंबुलेंस का लाभ तक नहीं मिल पाता। इससे भी बड़ी बात यह है कि आज तक 48 घंटे बीत जाने के बाद भी इस मामले में जिला प्रशासन ने किसी की जवाब देही तय नहीं की है। क्या जिला प्रशासन, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज के अधिकारी केवल खाना पूर्ति कर रहे हैं। जो अब तक इस बात की जवाब देही तय नहीं की गई।

वार्मर में कैसे हुआ शॉर्ट सर्किट, सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं ?

एक महिला के गर्भवती होने के बाद से लेकर उसके प्रसव तक। फिर प्रसव के बाद 1 साल तक बच्चों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी मध्य प्रदेश सरकार ने ले रखी है। गर्भवती महिलाओं का बाकायदा हर हफ्ते जांच होती है। उन्हें पोषित आहार उपलब्ध कराया जाता है । इतना ही नहीं बच्चों के जन्म के बाद उसके पोषण और स्वास्थ्य के लिए रुपए भी सरकार दे रही है। गर्भवती महिला को उसके घर से अस्पताल पहुंचाने और अस्पताल से फिर घर पहुंचने की जिम्मेदारी भी सरकार ने ले रखी है। इतनी सारी सुविधाओं के बाद जिला अस्पताल के एनआईसीयू वार्ड में जो की नवजात गहन चिकित्सा वार्ड कहलाता है। एक वार्मर में शॉर्ट सर्किट होता है।

यह बात हजम होने लायक नहीं है। क्योंकि जिस वार्मर में बच्चों को रखा जाता है। वह अत्यधिक सुरक्षित यंत्र समझा जाता है। ऐसी घटना इस यंत्र में होना संभव नहीं है। निश्चित रूप से या तो वार्मर खरीदी में चूक हुई है। और घूसखोरी की भेंट चढ़ी है। या जिला अस्पताल प्रबंधन ने इस गहन चिकित्सा इकाई में लापरवाही बरती है। विद्युत सप्लाई से लेकर वार्मर के रखरखाव में गलतियां की गई है। क्योंकि वार्मर में आग लगना सामान्य बात नहीं है। किसी भी वार्मर को इस तरह से सुरक्षित बनाया जाता है कि बच्चा उसमें सुरक्षित रहे। लेकिन यहां तो शॉर्ट सर्किट हुआ,आग लगी और एक बच्चे की मौत तक हो गई। उसके बाद भी जिला प्रशासन आज तक नहीं जागा।

सरकार की गलती नहीं, क्या कर रहे जिम्मेदार अधिकारी ?

छिंदवाड़ा जिला अस्पताल में स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्थाओं के लिए एक सिविल सर्जन नियुक्त किया जाता है। वर्तमान में डॉक्टर कंचन दुबे सिविल सर्जन है। इसके अलावा जिला अस्पताल में मेडिकल कॉलेज का अस्पताल भी संचालित हो रहा है। तो यहां मेडिकल कॉलेज के डीन की जवाबदारी भी स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के लिए है। इसके अलावा जिला अस्पताल में वार्डों के रखरखाव, उपकरणों के रखरखाव, गहन चिकित्सा संबंधी वार्डों में आवश्यक जरूरत का ध्यान रखने के लिए एक प्रबंधक भी नियुक्त किया गया है। यह प्रबंधक जिला अस्पताल के मैनेजमेंट के लिए नियुक्त है।

उसके बाद भी बच्चों के गहन चिकित्सा वार्ड में इस तरह की घटना घटती है। जिसे सरकार की गलती नहीं माना जा सकता। लेकिन जिला अस्पताल के यह आल्हा अधिकारी केवल खानापूर्ति के लिए जिला अस्पताल में घूम रहे हैं। वेतन लेकर आराम फरमा रहे हैं। लेकिन जिला अस्पताल के रखरखाव को लेकर अधिकारियों का रवैया उदासीन है। यह अधिकारी भी जिला अस्पताल की इंटरनल राजनीति में व्यस्त है। जिसका खुलासा आने वाले एपिसोड में किया जाएगा।

लापरवाही की हद… जिम्मेदार कौन ?
Avinaash Siingh
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