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2000 के दौर में लौटा शहर, अंधेरे में कटी रात, बिजली कंपनी भर रही जेब !

बिजली बिल 10 गुना बड़ा लेकिन जरा सी आंधी में अंधेरा

क्या सरकार और कंपनी लेगी ब्लैक आउट की जिम्मेदारी

छिंदवाड़ा। यह कैसा विकास कल रात अंधेरे में बिताने के बाद यह सवाल पूरी रात मेरे मन में कौंधता रहा कि आखिर यह कैसा विकास, बिजली की व्यवस्था निजी हाथों में सौंपने के बाद भी पूरी रात अंधेरे में काटनी पड़ी । रात अंधेरे में काटने वाला मैं अकेला नहीं बल्कि सैकड़ो परिवार और यह कोई गांव नहीं बल्कि छिंदवाड़ा शहर की बात चल रही है। जहां शनिवार की शाम आई एक आंधी ने ब्लैकआउट कर दिया। और कई क्षेत्र पूरी रात अंधेरे में डूबे रहे। आखिर एक बार फिर 2000 का वह दौर याद आ गया जब दिग्विजय सिंह की सरकार थी और बिजली कटौती जोरों पर थी। उसे दौर में भी कम से काम पूरी रात तो अंधेरे में कभी नहीं काटनी पड़ी। तब छत्तीसगढ़ अलग होने के कारण मध्य प्रदेश को बिजली के संकट से गुजरना पड़ रहा था। लेकिन आज तो 2026 है और 2003 से प्रदेश में भाजपा की सरकार है।

इतना ही नहीं बिजली की व्यवस्था निजी हाथों में सौंप दी गई है। उसके बाद भी आज 26 साल बाद पूरी रात अंधेरे में काटनी पड़ी तो यह सवाल उठकर खड़ा हुआ कि आखिर यह कैसा विकास है । और यह कैसे दावे है कि निजी हाथों में सुविधाएं बेहतर मिलेगी । क्योंकि 2000 से 2026 की बात करें तो बिजली का बिल 10 गुना से ज्यादा बढ़ गया। हर परिवार पर बिजली के बिल का एक नया बोझ है। लेकिन सुविधाएं गायब है, आखिर यह कैसा विकास है जिसमें ग्रामीण क्षेत्र तो दूर जहां लोगों को आदत है रात अंधेरे में काटने की। यहां तो शहर का शहर ही अंधेरे में डूबा हुआ है। इसकी जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा ? क्या सरकार इसकी जिम्मेदारी लेगी ! जन प्रतिनिधि इसकी जिम्मेदारी लेंगे ! या गर्मी की जो रात शहर वासियों ने अंधेरे में बिना पंखे कूलर की काटी है उसका मुआवजा बिजली कंपनी देगी।

पूरी गर्मी मेंटेनेंस फिर भी जरा सी आंधी से ब्लैक आउट

बिजली कंपनी मेंटेनेंस के नाम पर भीषण गर्मी में लोगों के घरों की बिजली बंद कर देती है। सुबह 7:00 बजे से लेकर कभी 11:00 बजे तक और कभी 2:00 बजे तक बिजली बंद रहती है । दावा किया जाता है कि बिजली कंपनी जिस क्षेत्र में बिजली बंद की गई है वहां का मेंटेनेंस कर रही है। पूरी गर्मी यही चला पूरा अप्रैल किसी न किसी क्षेत्र की बिजली चार से 6 घंटे तक के लिए बंद की गई। जबकि यह दौर 42 डिग्री के भीषण गर्मी का दौर था। यह मेंटेनेंस अभी पूरा मई भी चलने वाला है । लेकिन उसके बाद भी जरा सी आंधी से पूरा शहर अंधेरे में डूब जाता है। आखिर यह कैसा मेंटेनेंस है और क्या बिजली कंपनी पुराने बिजली के पोल पुरानी तारे और सरकारी महक में के द्वारा स्थापित किए गए उपकरणों से ही बिजली की व्यवस्था चला रही है। बिजली विभाग में अब सरकारी नियुक्तियां नहीं होती जो लोग रिटायर हो रहे है। उनका विकल्प बिजली कंपनी के पास नहीं है। बिजली कंपनी बहुत कम कीमत में मजदूरों को रखती है और उनसे ही मेंटेनेंस का कार्य करा रही है। जबकि आलम यह है कि बिजली कंपनी लगभग 15-17 सालों से मध्य प्रदेश में बिजली की कमान संभाले हुए है। लेकिन आज भी सरकारी पोल और सरकारी तारों से ही बिजली की व्यवस्था की जा रही है । कर्मचारियों के नाम पर पूरा शहर संभालने के लिए 10 कर्मचारी भी बिजली कंपनी नहीं रखें है।

टैरिफ से वसूल रहे बिजली बिल, मोटा मुनाफा और हाल बदतर

2003 के पहले डेड रुपए से लेकर ढाई रुपए तक प्रति यूनिट बिजली बिल लगता था । लेकिन जैसे ही बिजली व्यवस्था की कमान निजी कंपनी को सौंप गई आज 9 रुपए से लेकर 16 रुपए प्रति यूनिट तक बिजली का बिल लग रहा है। बड़ी बात यह है कि बिजली कंपनी ने घरेलू उपभोक्ताओं को एक दायरे में नहीं रखा। जबकि बिजली बिल टैरिफ के आधार पर वसूला जाता है। किसने कितनी बिजली जलाई और बिजली का बिल आसमान छूने लगता है। इस टैरिफ से बिजली बिल की वसूली के चलते बिजली कंपनी मोटा मुनाफा कमा रही है। लेकिन सुविधाओं के नाम पर जरा सी आंधी पूरा शहर अंधेरे में डूबा देती है। क्या सरकार ने बिजली कंपनी के साथ करार करते समय इस बात का जिक्र नहीं किया की बिजली कंपनी लोगों को सुविधा देगी। सरकारी महकमे की तरह बिजली गुल होने की जिम्मेदारी बिजली कंपनी की होगी।अगर यह करार किया गया है। तो फिर सरकार या सरकार के नुमाइंदे बिजली कंपनी पर दबाव क्यों नहीं बना पा रहे हैं कि आखिर पूरा शहर अंधेरे में कैसे डूबा और फिर 6 घंटे बाद बिजली आई तो केवल आधे शहर में। आधा शहर फिर भी अंधेरे की चपेट में था और पूरी रात इन शहर वासियों ने तारे गिनकर काटी।

खुला भ्रष्टाचार … Avinash Singh
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